मैंकार दर्शन
- श्रीकृष्ण द्वारा मैंरत्नेश्वर को दिया गया ज्ञान मैंकार दर्शन है.
- “जो अंधकार है और प्रकाश भी है. जो अंधकार और प्रकाश दोनों के मध्य खड़ा अंधकार और प्रकाश का द्रष्टा भी है. अर्थात् जो अंधकार है और नहीं भी है; जो प्रकाश है और नहीं भी है; जो द्रष्टा है और नहीं भी है, वह मैंकार है.
- जो ध्वनि है और अध्वनि भी है. जो ध्वनि और अध्वनि के मध्य खड़ा अश्रोता-श्रोता भी है. अर्थात् जो ध्वनि है और नहीं भी है; जो अध्वनि है और नहीं भी है; जो अश्रोता-श्रोता है और नहीं भी है, वह मैंकार है.
- जो रस है और नीरस भी है. जो रस और नीरस के मध्य अरसिक-रसिक बना खड़ा है. अर्थात् जो रस है और नहीं भी है; जो नीरस है और नहीं भी है; जो अरसिक-रसिक है और नहीं भी है, वह मैंकार है.
- जो अज्ञ है और सर्वज्ञ भी है. जो अज्ञ और सर्वज्ञ के मध्य खड़ा सोहम भी है. अर्थात् जो अज्ञ है और नहीं भी है; जो सर्वज्ञ है और नहीं भी है; जो सोहम है और नहीं भी है, वह मैंकार है.
- जो सगुण है और निर्गुण भी है. जो सगुण और निर्गुण के मध्य खड़ा साक्षी ब्रह्म-अब्रह्म भी है; अर्थात् जो सगुण है और नहीं भी है; जो निर्गुण है और नहीं भी है; जो ब्रह्म-अब्रह्म है और नहीं भी है, वह मैंकार है.”
- “जो श्वेत विवर है और श्याम विवर भी है. जो श्वेत विवर और श्याम विवर के मध्य कवचीय अधोमार्ग का यात्री भी है. अर्थात् जो श्वेत विवर है और नहीं भी है; जो श्याम विवर है और नहीं भी है; जो श्वेत विवर और श्याम विवर के मध्य कवचीय अधोमार्ग का यात्री है और नहीं भी है, वह मैंकार है.”
- “जो दृश्य है और द्रष्टा भी है, वह मैंकार है.
- जो दाता है और याचक भी है, वह मैंकार है.
- जो द्रष्टा है और श्रष्टा भी है, वह मैंकार है.”
- “निराकार और साकार के मध्य नृत्य करने वाला मैंकार कला से युक्त है.
- आस्तिक और नास्तिक के मध्य गीत गाने वाला मैंकार कला से पूर्ण है.
- अर्थात् जो कण-अकण में सदैव उपस्थित धुन है, वह मैंकार कला में सम्पूर्ण है.”
* * *
