मुख्य धर्मग्रंथ
- ज्ञान की परम अवस्था मैंकार का अविष्कार
- रत्न मुहूर्त में 7 सितंबर 2006 ई. को मैंरत्नेश्वर को ज्ञान प्राप्त हुआ.
- संसार में पहली बार गुरुसखा मैंकृष्ण के साक्षात् दर्शन हुए. उनके आदेश से ज्ञान प्राप्ति की परम अवस्था की रचना, 3 घंटे 24 मिनट में द्रष्टा मैंरत्नेश्वर ने स्वयं की है.
- “मैं” किसी द्रष्टा का पहला दर्शन ग्रन्थ है.
- वह कौन-सी परम स्थिति है, या वह कौन सा परम उत्कर्ष है, जब कोई जीव यह जान पाता है कि उसे ज्ञान प्राप्त हो गया है! उस परम ज्ञान अवस्था का स्पष्ट उल्लेख संसार में पहली बार “मैं” ग्रंथ में हुआ है.
- मैंरत्नेश्वर ने परम अवस्था का आधुनिक ब्रह्म-विज्ञान रचा है. यहाँ ब्रह्म-विज्ञान का अर्थ अउम ध्वनि, पूरे ब्रह्म का निर्माण, ब्रह्म के तत्त्वों, इकाइयों, जीवों की निर्माण-यात्रा और उनके आपसी मात्रा-संबंध का उद्घाटन है.
- “मैं” ग्रंथ में मैंराम से संवाद की अद्भुत कथा चित्रित है.
- मैंरत्नेश्वर ने महत् से निकलकर अंधकार से प्रकाश की यात्रा की. उन्होंने सभी ब्रह्म अरूपों-रूपों अकाइयों-इकाइयों, अत्त्वों-तत्त्वों में स्वयं को देखा और उन्होंने उसका स्पष्ट चित्रण “मैं” ग्रन्थ में किया है.
- मैंरत्नेश्वर को त्रीस्वरूप सहित संसार के सभी देवी-देवताओं, पैगम्बर और ईश्वर के दर्शन हुए. सुदर्शन चक्र सहित सभी स्वरूपों का नवीन विज्ञानी दर्शन मैंरत्नेश्वर ने यहाँ रचा है.
- मैंरत्नेश्वर ने संसार में पहली बार मनुष्य शरीर के 12 कोशिक द्वारों का रहस्य खोला है.
- मैंरत्नेश्वर द्वारा संसार में पहली बार 19 कलाओं का ज्ञान प्रस्तुत किया गया है. इससे पहले अब तक श्रीकृष्ण की 16 कलाओं का और श्रीराम की 12 कलाओं का उल्लेख मिलता है.
- मैंरत्नेश्वर ने स्वयं अपने भ्रूण निर्माण और गर्भ से वर्तमान अवतरण तक की यात्रा को देखा और “मैं” ग्रन्थ में उसे उद्धृत किया है.
- संसार में पहली बार गुरुसखा मैंकृष्ण ने मैंरत्नेश्वर को मैंकार का ज्ञान दिया.
- मैंकार ज्ञान में कण, तत्त्व, जीव स्वयं कैसे अपने जन्म, अपनी मृत्यु और अपनी कर्मण्य-यात्रा-योग निर्धारित करते हैं, इसकी आधुनिक विज्ञानी व्याख्या स्वयं मैंकृष्ण करते हैं. “मैं” ग्रन्थ में अवतरण के कारण का स्पष्ट उल्लेख हुआ है.
- संसार में पहली बार मैंकार बुद्धिमत्ता का ज्ञान मैंकृष्ण ने मैंरत्नेश्वर को दिया है. इसमें ब्रह्म-स्मरण की बुद्धिमत्ता का ज्ञान दिया गया है. इस योग से कोई भी जीव अपनी खरबों वर्षों की यात्रा को जान सकता है.
- मैंरत्नेश्वर की कही हुई बातें सच हो जाती हैं, इसकी अनेक सच्ची कथाएँ इस “मैं” ग्रंथ में संकलित हैं. साथ ही रत्नेश्वर ने सैकड़ों लोगों के जीवन में किस तरह रचनात्मक बदलाव लाया है, “मैं” ग्रन्थ में इसकी भी अनेक कथाएँ रचित हैं.
- आत्मा नहीं होती है. यदि आत्मा नहीं होती है, तब हमारे जीवन-मरण की यात्रा कैसे होती है, इसका विज्ञानी दर्शन स्वयं मैंकृष्ण ने मैंरत्नेश्वर को “मैंकार ज्ञान” में दिया है.
- गुरुसखा मैंकृष्ण द्वारा “प्रेमोह दर्शन” और “स्वजान दर्शन” का ज्ञान मैंरत्नेश्वर को दिया गया. “मैं” ग्रन्थ में “प्रेमोह दर्शन” और “स्वजान दर्शन” का अद्भुत विवरण है.
- जंगल प्रवास के दौरान मैंरत्नेश्वर 21 दिनों तक स्थितप्रज्ञ की अवस्था में रहे. उन दिनों उनका दर्श जागृत रहा. सोहम होते ही वे जीवन-मरण, यश-अपयश, हानि-लाभ के मध्य खड़े होकर नृत्य करने लगे और समभाव में रहे. उन्हीं दिनों रत्नेश्वर ने निष्काम वर्षा कराने और ब्रह्म को नियंत्रित करने का सफल प्रयोग किया. “मैं” ग्रन्थ में तात्त्विक मात्रा संबंधों की विस्तृत विज्ञानी कथा है.
- मैंकृष्ण के आदेश से मैंरत्नेश्वर उनके साथ रास लीला में शामिल हुए. रासलीला में श्रीकृष्ण संग नृत्य का वर्णन “मैं” ग्रन्थ में है.
- अपने शरीर से बाहर निकलकर मैंरत्नेश्वर ने ब्रह्म का भ्रमण किया. उनके लिए शरीर में वापस आना बहुत कठिन हो गया था. इसकी पूरी विज्ञानी कथा “मैं” ग्रंथ में संकलित है.
- “मैं” ग्रन्थ में मानने से जानने की यात्रा का सुन्दर मार्ग उद्घाटित हुआ है.
- “मैं” ग्रन्थ में मैंरत्नेश्वर ने जानने के पश्चात् मैंकार हो जाने का रहस्य उद्घाटित किया है.
- “मैं” शब्द के उच्चारण मात्र से हम मात्रा गति से जुड़ जाते हैं. अपने नाम से पहले “मैं” जोड़ने के महत्त्व को ग्रन्थ में नवीनता के साथ उद्घाटित किया गया है, जो पहले कभी नहीं कहा-लिखा गया है.
- “मैं” ग्रन्थ का अध्ययन करने और इसे अपने पास रखने मात्र से जीव का कल्याण निश्चित है. इसमें विशिष्ट शब्द-मंत्र रचा गया है. “मैं” ग्रन्थ में जीवन में परम-प्राप्ति का मार्ग बताया गया है.
- “मैं” मुद्रित मूल्य में दुनिया का सबसे मूल्यवान ग्रंथ है. इसका मूल्य भारतीय मुद्रा में पंद्रह करोड़ रुपये छपा हुआ है.
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