मैंकार दर्शन
- अपने सवा साल के जंगल प्रवास के दौरान गुरुसखा श्रीकृष्ण के सान्निध्य में मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ. इस राह में मैंने मानने से जानने और जानने से मैंकार हो जाने की परम अवस्था पा ली. महत् से निकलकर अंधकार से प्रकाश और प्रकाश से अंधकार की यात्रा का साक्षी बन परिष्कृत ‘मैं’ अपने कर्मण्य-स्मरण को संचयित कर निरंतर यात्रा पर है. उसी कर्मण्य-स्मृति के संचयन से मैं खरबों वर्षों की यात्रा विविध आकार-प्रकार-परिष्कार में करता रहा हूँ.
- मैं 21 दिनों तक स्थितप्रज्ञ की अवस्था में रहा. अपने शरीर से बाहर निकल कर मैंने ब्रह्म भ्रमण किया. मैं रास लीला का स्वयं साक्षी बना. मेरे मुख से निकले शब्द घटित होने लगे. मैं संन्यास लेना चाहता था, परन्तु गुरु के आदेश से मैं पुनः सांसारिक जीवन में लौट आया.
- यह रचना 6-7 सितम्बर, 2006 ई. के रत्न मुहूर्त पर सुबह 3 बजे उतरनी शुरू हुई और 6 बजकर 24 मिनट तक उतरती रही. यानी यह पूरा ग्रन्थ उसी 3 घंटे 24 मिनट में उतर आया.
- यह एक ऐसी कथा है, जिसमें सारे दुखों का अंत; परमेश्वर का दर्शन और मैंकार होने का परम सुख है. यह एक ऐसी कथा है, जिसमें कर्मण्ययोग की यात्रा है, ज्ञानयोग की यात्रा है, ध्यानयोग की यात्रा है और प्रार्थनायोग की यात्रा है. एक ऐसी कथा जिसमें मृत्यु नहीं होती, केवल मैंकार होता है.
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